#बिहार, जो सम्राट अशोक और शेरशाह सूरी के बिछाए राजमार्गों के लिए मशहूर था हमारा अपना बिहार,
और जो बिहार कभी शिक्षा और संस्कृति की धरोहर के रूप में जाना जाता था ,ऐसा लगता है के वो बिहार आज अपनी ज़िन्दगी की आखरी सांसें गिन रहा है,
और जो बिहार कभी शिक्षा और संस्कृति की धरोहर के रूप में जाना जाता था ,ऐसा लगता है के वो बिहार आज अपनी ज़िन्दगी की आखरी सांसें गिन रहा है,
बिहार के साथ प्रॉब्लम ये है कि उसने अराजक होने को ही अपना स्वभाव अपनी आदत मान लिया है
और यह अराजकता अब उसके जीवन का हिस्सा बन गई है.
और यह अराजकता अब उसके जीवन का हिस्सा बन गई है.
तुअज्जुब तो ये है कि आज यह अराजकता बिहारियों के लिए गौरव का विषय बना हुआ है.
आज गांव में बसा हुआ बिहारी अपनी दुर्गति को नियति मान बैठा है.
सुशासन और विकास के दम भरने वाले महापुरुष अपनी सियासी चक्की में लोगों का विश्वास का गला घोंट रहे हैं।
आज गांव में बसा हुआ बिहारी अपनी दुर्गति को नियति मान बैठा है.
सुशासन और विकास के दम भरने वाले महापुरुष अपनी सियासी चक्की में लोगों का विश्वास का गला घोंट रहे हैं।
आज़ादी के समय के बिहार को याद करें. और आज़ादी के समय ही क्यों, उसके बाद भी लोहिया -जेपी के आंदोलनों के बिहार को देखें....
लेकिन आज बिहार ने बदलाव की उम्मीद ही छोड़ दी है.
आज भी अगर बिहारी एक बार बिहार में बदलाव की बयार के लिये सोच भर ले, तो यकीन मानें, तस्वीर बदल जाएगी.
कुछ ऐसा ही सपना लेकर हमारे बीच मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब ने भी इंट्री मारी थी , पर इन बिहार में बैठे सत्ता के गिद्धधों की गिद्ध नज़र लग गई .और कुछ अबूझ सहकर्मीयों की वजह से सत्ताधारी मगरमछों के बिछाये जाल में फंस गए ,
हमें आशा है और एक बहुत पुरानी कहावत के मुताबिक़के बिहार में इतनी शक्ति है के वो अपनी राख में से उठ खड़ा होगा.
लेकिन आज बिहार ने बदलाव की उम्मीद ही छोड़ दी है.
आज भी अगर बिहारी एक बार बिहार में बदलाव की बयार के लिये सोच भर ले, तो यकीन मानें, तस्वीर बदल जाएगी.
कुछ ऐसा ही सपना लेकर हमारे बीच मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब ने भी इंट्री मारी थी , पर इन बिहार में बैठे सत्ता के गिद्धधों की गिद्ध नज़र लग गई .और कुछ अबूझ सहकर्मीयों की वजह से सत्ताधारी मगरमछों के बिछाये जाल में फंस गए ,
हमें आशा है और एक बहुत पुरानी कहावत के मुताबिक़के बिहार में इतनी शक्ति है के वो अपनी राख में से उठ खड़ा होगा.

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