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Saturday, August 28, 2021

परदेसी की ज़िन्दगी

 कहते हैं कि एक न एक दिन हर बिछड़ा हमेशा के लिए मिल जाएगा,

लेकिन उसका क्या जो किसी न किसी हालात के तहत अपना घरबार अपना सब कुछ छोड़ कर परदेस जा बसा, और सार दो साल बाद छुटियां बिताने के नाम पर चंद सांसे अपनों के साथ बिताने चला आता है, लेकिन हक़ीक़त में उसका दिल कभी भी इस खुशी से सैराब नही हो पाता, क्योंकि आखिर उधार की सांसें कितना सकूंन दे सकती है? छुट्टियों पर आने से पहले ही जाने का दिन मुकरर हो जाता है।

जवानी के दिन का निकला घर आया तो शादी हुई फिर बच्चे किस्तों में हुए, उनके साथ भी जी भर के अपना प्यार नही लुटा पाया, बच्चा जब तक अपने बाप को पहचानता है तबतक छुट्टियां खत्म हो जाती है, दुबारा आया तो बच्चा दौड़ने भागने लगता है, और इसी तरह एक एक करके दिन काट जाते हैं, और जब रिटायरमेंट का समय आता है तो बेटा जवान हो कर खुद रोज़ी की तलाश में बाहर चला जाता है।

बीवी बूढ़ी और कमज़ोर तरह तरह की बीमारियों का ढेर हो जाती है।

बस यही है एक परदेसी की ज़िंदगी।

Friday, May 7, 2021

शेरे सिवान मोहम्मद शहाबुद्दीन

 सिवान की अवाम को एक अरसे से मोहम्मद शहाबुद्दीन की वापसी का इंतज़ार था ताकि वे फिर सिवान को पहले जैसा फलता फूलता देख पाते ,लेकिन अफसोस सद अफसोस कि ये क़ुदरत को मंजूर नही था और साहेब कुछ लोगों के नापाक साज़िश का शिकार होकर माअबूदे हक़ीक़ी से जा मिले।

अब उनके बेटे ओसामा शहाब पर लोगों की नज़रें टिकी है, अब देखते हैं हिना मैडम के साथ ओसामा शहाब का क्या एक्शन प्लान होता है , और वे किस तरह अपने चाहने वालों के बीच आते हैं ,और क्या रणनीति अपनाते हैं।

क्योंकि जिस तरह से बिहार की पोलिटिकल पार्टियों ने उनका इस्तेमाल किया और उनके परिवार को तनहा छोड़ दिया और फिर उन्हें भूल गए, लेकिन वे ये भी भूल गए कि शहाबुद्दीन के नाम से ही इलेक्शन में लोग कामयाब हो जाते हैं।


जो लोग उनके नाम मात्र से ही अपना पेंट गीली कर दिया करते थे आज उनके जाने के बाद उनके खिलाफ जिस तरह उनके बारे में अपशब्द बोल रहे हैं उन्हे ये याद रखना चाहिए कि शहाबुद्दीन उस टीपू सुल्तान के कौम से हैं जिन्हें मारने बाद भी अंग्रेजों को उनके लाश के पास जाने की हिम्मत न हुई।

Thursday, February 2, 2017

झूट बोलूं तो खुद पत्थर हो जाऊं

सच बोलूं तो पत्थर चले मुझ पर
झूट बोलूं तो खुद पत्थर हो जाऊं

आ समेट लूँ तुझे अपनी आगोश में
डूबा लूँ खुद में और समंदर हो जाऊं

तुझसे बिछड़ के अब लगता है मुझे
जिस्मो जान से मैं अब बेघर हो जाऊं

मेरी ये शादाबी तुम से है नासिर
तू अगर न हो तो मैं बंजर हो जाऊं 

Saturday, January 28, 2017

तुझे आखिर ये क्या हो गया है

तुझे आखिर  ये क्या  हो गया है
किस बात पे तू मुझ से खफा है

तू कहे तो छोड़ दूं ये खुदाई भी
सिर्फ कह दे यही  के तू मेरा है

जिस्म हूँ मैं तो  ,तू  जान है मेरी
फिर भी क्यों तू मुझ से जुदा है

बिछड़ के भी तुझसे मैं ज़िंदा रहा
शायद ये किसी की  बददुआ है

सबकी अपनी अपनी मजबूरियां है
कैसे कहदूँ नासिर के तू बेवफा है 

Sunday, January 8, 2017

तू मेरे साथ रह के भी मुझको कभी न मिला

इस शहरे बे अमां में अपना कोई न मिला
गले लगाके जिसे रो सकूँ ऐसा कोई न मिला

जानते हैं सब यहां ओहदों के नाम से
ढूढने के बाद भी कोई आदमीं न मिला

इस कायनात से बस एक तुझे ही माँगा था
मगर मेरा नसीब के मुझे तू ही न मिला

नज़दीकियों के बाद भी तुझ को न देख पाया
तू मेरे साथ रह के भी मुझको कभी न मिला

सारे रिश्ते यहां नासिर घरों में रहते हैं
इस शहर में कोई भी अजनबी न मिला

Monday, January 2, 2017

Happy new year

नए साल पे मिले मेरे शनासाई बहुत
न जाने क्यों आज तेरी याद आई बहुत

मज़बूत जान के खुदको पत्थर बना लिया
टूटा जो आज तो आवाज़ आई बहुत,

Sunday, December 25, 2016

,,बिहार की राजनिति और मुस्लिम समाज,,

बिहार राज्य की मुस्लिम आबादी लगभग 17 प्रतिशत के आसपास है और यहाँ के 13 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ मुसलमानों की आबादी 18 से 44 फ़ीसद के बीच है. किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में तो 69 फ़ीसद मुसलमान हैं.
इन इलाक़ों में हिदू और मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण कराके वहाँ भाजापा ने अपना झाड़ा गाड़ा है, और इसका फायदा हमेशा भाजपा को ही मिला है.
यानी बिहार में भाजपा वहीं मज़बूत है, जहाँ मुस्लिम आबादी ज़्यादा है।
इस बात से यूपी वालों को सबक़ लेना चाहिए अभी उनके सर पे इलेक्शन हैक्योंकि वहाँ मुस्लिम आबादी बिहार से कहीं ज़्यादा है।
2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी की 'ख़ास छवि' के कारण यह ध्रुवीकरण और ही बढ़ गया था
भाजपाई ख़ेमे को पहले ही पता चल चूका था के नरेन्द्र मोदी के रास्ते का 'नीतीश रूपी रोड़ा' हट चुका है उस से हमें कोई ख़ास नुक्सान नै होने वाला है ,इसी लिए वो मुत्मइन थे ,
मगर नितीश कुमार ने अपने ख़ास अंदाज़ में सेक्युलरिज़्म और धर्मनिरपेक्षता का जो नकली चादर ओढ़ कर बिहार में गेम खेला जिसकी वजह से मोदी और अमित शाह की जोड़ी समझ ही नहीं पायी और धारा शाही हो गई।

बिहार में २०१४ के इलेक्शन में मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने में नीतीश कुमार ने जिस तरह 'नरेन्द्र मोदी का हौवा खड़ा किया था और उसका विरोध' करना शुरू करदिया था अब उसकी पोल खुलती नज़र आरही है, क्योंकि उन्हें ये भी डर भी सताने लगा है के उनका भाजपा से सम्बन्ध भी न टूट जाये इसी लिए सेक्युलरिज़्म का नाटक छोड़ आजकल भाजपा बिर्गेड से मिलना जुलना बढ़ गया है।