बीच मंझार में बन्दों का वो मदगार बना देता है
हमारा रब , तिनको को भी पतवार बना देता है
ऐतबार तो कर के देखो मेरे रब्बे करीम पर तुम
आतिशे नमरूद को भी, वो गुलज़ार बना देता है
देता है बे इन्तहा वो जब चाहे जिसे चाहे
लेने पे आये तो दरदर का तलबगार बना देता है
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