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Wednesday, December 21, 2016

चल ले चल अब अपनी नाव ले चलें

चल ले चल अब अपनी नाव ले चलें 
समन्दर के उस पार अपने गांव ले चलें 
बहुत दिन हुए अब हमें अकेला रहते 
सपनों से अपने दूर इस शहर में रहते 
चल तुझे फिर उस ठण्डी छाँव ले चलें 
कुछ दिन तो जी ले अब अपना जीवन
अब राह निहारे तुम्हे अपना घर आँगन
हिम्मत कर उठा क़दम अब पाँव ले चलें
अपनी बूढी माँ के था आँख का तारा
तू ही तो था अब्बा के लाठी का सहारा
चल चूम ले जन्नत माँ के पाँव ले चलें
तूने देख लिए ये कैसे कैसे सपने
जहां पे न हों कोई भी अपने
फिर भी तू जिए जा रहा था
अपने आंसू पिए जा रहा था
चल फिर जहां है ठण्डी छांव ले चलें
वल ले चल अब अपनी नाव ले चलें,


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