Nasir Siddiqui
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Wednesday, December 21, 2016
सारे रंगों के बीच एक मैं ही था तनहा
सारे रंगों के बीच एक मैं ही था तनहा
सारे लोगों के बीच एक मैं ही था तनहा
बेमानी से लग रहे थे सब अलफ़ाज़ मेरे
उन इशारों के बीच एक मैं ही था तनहा
समन्दर की लहरें अपने शबाब पर थीं
उन लहरों के बीच एक मैं ही था तनहा
हमारे बीच न जाने कैसी छा गई उदासी
ग़मों के धुप में एक मैं ही था तनहा
थे मुंसिफ भी वज़ीर भी दरबारे इश्क़ में
उस भरे दरबार में एक मैं ही था तनहा
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