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Thursday, March 20, 2025

رمضان کی فضیلت اور روزے کی برکت

 

"رمضان رحمت، مغفرت اور جہنم سے نجات کا مہینہ ہے۔ روزہ صرف بھوک اور پیاس کا نام نہیں، بلکہ دل و روح کی پاکیزگی کا ذریعہ ہے۔ جو شخص ایمان اور اخلاص کے ساتھ روزہ رکھتا ہے، اللہ اس کے گناہ معاف فرما دیتا ہے۔

— ’’الصوم جنة‘‘ (روزہ ڈھال ہے) – حدیث نبوی ﷺ

روزہ صرف کھانے پینے سے رکنے کا نام نہیں، بلکہ اپنی زبان، آنکھ، اور دل کو بھی برائی سے بچانے کا نام ہے۔ جب بندہ روزہ رکھ کر صبر کرتا ہے، تو اللہ اسے ایسی رحمت اور برکت عطا کرتا ہے، جو دنیا کی کسی نعمت سے زیادہ قیمتی ہے۔"

رمضان کا دن صبر، عبادت اور نیکیوں میں سبقت لے جانے کا وقت ہے، اور اس کی رات رحمت، مغفرت اور قبولیتِ دعا کا لمحہ ہے۔ ایمان والے اس مہینے میں اپنے رب کی رحمت سمیٹتے ہیں اور ہر لمحہ قربِ الٰہی کی جستجو میں رہتے ہیں۔



Tuesday, March 18, 2025

زکوٰۃ: ایمان کی تجدید اور معاشرتی ہم آہنگی کا ذریعہ

زکوٰۃ نہ صرف ایک مالی عبادت ہے بلکہ یہ مسلمان کی روحانی پاکیزگی اور معاشرتی نظام میں انصاف و برکت کے فروغ کا بہترین ذریعہ بھی ہے۔ قرآنِ پاک اور احادیثِ مبارکہ میں زکوٰۃ کی تاکید اس بات کی دلیل ہے کہ مال حقیقی ملکیت نہیں بلکہ اللہ کی امانت ہے۔ زکوٰۃ ادا کرنے سے دل میں لالچ اور بخل کا خاتمہ ہوتا ہے اور انسان اپنی نعمتوں کا شکر ادا کرتے ہوئے اللہ کی رضا حاصل کرتا ہے۔

اسلامی معاشرہ میں زکوٰۃ کے ذریعے دولت کا ایک حصہ امیروں سے غریبوں کی طرف منتقل ہوتا ہے، جس سے نہ صرف فرداً فرداً غربت مٹتی ہے بلکہ اجتماعی سطح پر بھی معاشرتی توازن برقرار رہتا ہے۔ زکوٰۃ کی ادائیگی سے نہ صرف مادی برکت حاصل ہوتی ہے بلکہ اس سے انسان کی روحانی بلندی اور تقویٰ میں بھی اضافہ ہوتا ہے، جیسا کہ سورۃ التغابن میں ارشاد ہوا ہے کہ اللہ تعالیٰ قرض دو تو اسے دوگنا کر دیتا ہے۔

مزید برآں، زکوٰۃ کے نظام کے تحت حکومتیں بھی معاشرتی فلاح و بہبود کے منصوبے نافذ کر سکتی ہیں، جیسے کہ بے روزگاری، علاج معالجہ، تعلیم اور دیگر بنیادی ضروریات کی فراہمی۔ اس طرح نہ صرف فرد کی بلکہ پورے معاشرے کی اقتصادی حالت میں بہتری آتی ہے، اور معاشرتی انصاف کے تقاضے پورے ہوتے ہیں۔

نتیجہ:
زکوٰۃ دین کا ایک اہم رکن ہے جو ایمان کی تجدید کے ساتھ ساتھ معاشرتی ہم آہنگی اور اقتصادی ترقی کا بھی باعث بنتی ہے۔ ہمیں چاہیے کہ اپنی نعمتوں کا حصہ اللہ کی راہ میں خرچ کر کے نہ صرف اپنی روح کو پاک کریں بلکہ اپنے معاشرے میں برکت و بھائی چارہ بھی فروغ دیں۔

Sunday, May 19, 2024

भाईचारा

 आजकल समाज में एक खतरनाक धार्मिक कट्टरता है जो हमारी आने वाली नस्लों के लिए बहुत घातक है।

लोगों के दिलों से धार्मिक कट्टरता के बजाय प्रेम और भाईचारा लाने के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे:

1. **शिक्षा और जागरूकता:** शिक्षा प्रणाली में सहिष्णुता, विविधता और एकता के महत्व को बढ़ावा दें। बच्चों को विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के बारे में सिखाएं ताकि वे एक-दूसरे का सम्मान करना सीखें।

2. **सकारात्मक संवाद:** समाज में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करें। आपसी समझ और सहयोग बढ़ाने के लिए सामूहिक कार्यक्रमों और चर्चाओं का आयोजन करें।

3. **मीडिया की भूमिका:** मीडिया को सकारात्मक और एकता बढ़ाने वाले संदेश प्रसारित करने चाहिए। नकारात्मकता और भेदभाव को कम करने के लिए जिम्मेदार पत्रकारिता आवश्यक है।

4. **सामुदायिक गतिविधियाँ:** विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों को एक साथ लाने के लिए सामुदायिक गतिविधियों और त्यौहारों का आयोजन करें। इससे लोगों के बीच आपसी समझ और संबंध मजबूत होंगे।

5. **नेतृत्व का उदाहरण:** नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों को प्रेम और भाईचारे का संदेश फैलाना चाहिए। उनके सकारात्मक उदाहरण से समाज में बदलाव लाया जा सकता है।


6. **धार्मिक संस्थाओं की भूमिका:** धार्मिक संस्थाओं को भी सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश फैलाना चाहिए। वे अपने अनुयायियों को प्रेम और शांति के महत्व के बारे में शिक्षित कर सकते हैं।

इन प्रयासों से, हम धीरे-धीरे समाज में प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देकर धार्मिक कट्टरता को कम कर सकते हैं। यह हमारी आने वाली नस्लों के लिए एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण भविष्य सुनिश्चित करेगा।

Tuesday, October 19, 2021

तन्हाई

 ये जो अतराफ़ में रिश्तों का जाला है 

एक भी इसमें न काम आने वाला है


नही उम्मीद कोई  साये से भी अपने

इसका लहजा भी तो ज़माने वाला है


यादे माज़ी में रोने से अब क्या हासिल 

गुज़र गया जो ज़माना न आने वाला है


है अगर शौके मुहब्बत तो यादों से करो

यही वो शय है जो साथ निभाने वाला है


आओ अब लौट चलें अपने आशियाने में 

धूप तेज़ है बाहर तूफां भी आने वाला है।

Saturday, August 28, 2021

परदेसी की ज़िन्दगी

 कहते हैं कि एक न एक दिन हर बिछड़ा हमेशा के लिए मिल जाएगा,

लेकिन उसका क्या जो किसी न किसी हालात के तहत अपना घरबार अपना सब कुछ छोड़ कर परदेस जा बसा, और सार दो साल बाद छुटियां बिताने के नाम पर चंद सांसे अपनों के साथ बिताने चला आता है, लेकिन हक़ीक़त में उसका दिल कभी भी इस खुशी से सैराब नही हो पाता, क्योंकि आखिर उधार की सांसें कितना सकूंन दे सकती है? छुट्टियों पर आने से पहले ही जाने का दिन मुकरर हो जाता है।

जवानी के दिन का निकला घर आया तो शादी हुई फिर बच्चे किस्तों में हुए, उनके साथ भी जी भर के अपना प्यार नही लुटा पाया, बच्चा जब तक अपने बाप को पहचानता है तबतक छुट्टियां खत्म हो जाती है, दुबारा आया तो बच्चा दौड़ने भागने लगता है, और इसी तरह एक एक करके दिन काट जाते हैं, और जब रिटायरमेंट का समय आता है तो बेटा जवान हो कर खुद रोज़ी की तलाश में बाहर चला जाता है।

बीवी बूढ़ी और कमज़ोर तरह तरह की बीमारियों का ढेर हो जाती है।

बस यही है एक परदेसी की ज़िंदगी।

Friday, May 7, 2021

शेरे सिवान मोहम्मद शहाबुद्दीन

 सिवान की अवाम को एक अरसे से मोहम्मद शहाबुद्दीन की वापसी का इंतज़ार था ताकि वे फिर सिवान को पहले जैसा फलता फूलता देख पाते ,लेकिन अफसोस सद अफसोस कि ये क़ुदरत को मंजूर नही था और साहेब कुछ लोगों के नापाक साज़िश का शिकार होकर माअबूदे हक़ीक़ी से जा मिले।

अब उनके बेटे ओसामा शहाब पर लोगों की नज़रें टिकी है, अब देखते हैं हिना मैडम के साथ ओसामा शहाब का क्या एक्शन प्लान होता है , और वे किस तरह अपने चाहने वालों के बीच आते हैं ,और क्या रणनीति अपनाते हैं।

क्योंकि जिस तरह से बिहार की पोलिटिकल पार्टियों ने उनका इस्तेमाल किया और उनके परिवार को तनहा छोड़ दिया और फिर उन्हें भूल गए, लेकिन वे ये भी भूल गए कि शहाबुद्दीन के नाम से ही इलेक्शन में लोग कामयाब हो जाते हैं।


जो लोग उनके नाम मात्र से ही अपना पेंट गीली कर दिया करते थे आज उनके जाने के बाद उनके खिलाफ जिस तरह उनके बारे में अपशब्द बोल रहे हैं उन्हे ये याद रखना चाहिए कि शहाबुद्दीन उस टीपू सुल्तान के कौम से हैं जिन्हें मारने बाद भी अंग्रेजों को उनके लाश के पास जाने की हिम्मत न हुई।

Thursday, February 2, 2017

झूट बोलूं तो खुद पत्थर हो जाऊं

सच बोलूं तो पत्थर चले मुझ पर
झूट बोलूं तो खुद पत्थर हो जाऊं

आ समेट लूँ तुझे अपनी आगोश में
डूबा लूँ खुद में और समंदर हो जाऊं

तुझसे बिछड़ के अब लगता है मुझे
जिस्मो जान से मैं अब बेघर हो जाऊं

मेरी ये शादाबी तुम से है नासिर
तू अगर न हो तो मैं बंजर हो जाऊं